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Thursday, 19 September 2013

'' बातें ''

बातों की बनावट में
कहीं भी पहिया जैसी चीज नहीं है
फिर भी बातें
घुमा-फिराकर की जाती हैं

मीलों दूर
किसी से बात करने का जिम्मा
हमने कागज की चिठ्ठी-पत्री पर डाला है

आँखें जब आँखों से बात करती हैं
तब होंठों को
बंद करना पड़ता है अपनी आँखे

बातें कभी-कभी
शहद सी मीठी हो जाया करती हैं

बातें
बरसों बाद खुलती हैं
किसी पुरानी पोटली के गठान की तरह

अपने बड़ों की बातें
परदेश में
खींचलेते हैं कदम
अँधेरे से उजाले की ओर

Monday, 16 September 2013

किसे रोक रहें हैं हम

[मित्र राजेश गनोदवाले के लेख से प्रेरित ]
मैं लौटता हूँ
अपने देश के ओर
अपनी धरती में
जिसे मैं छोड़ आया हूँ अभी-अभी
वह भी धरती ही है
उस धरती में भी
फसलें लहलहाती हैं
उस धरती की मिट्टी में भी
अपनी उपस्थिति दर्ज कराते
वर्षों से खड़े हैं वृक्ष
मैं विचारों में गुम हुआ
स्वयं को साथ लेकर
रेलगाड़ी के डिब्बे में लौटता हूँ
अमृतसर की ओर बढ़ती है गाड़ी
यात्रिओं के चेहरे बदले से नजर आते हैं
मानों इसी पल की प्रतीक्षा थी
कितना करीब है
लाहौर से अमृतसर
धरती एक होकर भी
हम एक नहीं
आकाश एक होकर भी
हम एक नहीं
सीमा को रेखांकित करते
ये कटीले तार नहीं जानते
कि बांटने को खड़े हैं
कटीले तारों के दोनों तरफ
अलहदा कुछ भी नहीं
एक से खेत
एक सी फसल
एक सा जल
एक सी गंध
एक सी इबादत
और प्रकृति ने दिया
जो कुछ
वह एक सा
फिर यह भारी भरकम
फाटक क्यों
किसे रोक रहें हैं हम
क्या हम ठण्डी हवाओं को रोक पायेंगें
रोक पायेंगे बारिशों को
क्या धूप की तपिश को रोक पायेंगें
क्या हम उन पछियों को रोक पायेंगे
जो दोनों देशों में चह्चहाते हैं
जो दिलों में
एक दूसरे से बंधें हैं
उनके लिए कोई कानून
काम कर पायेगा
एक पल को
पंछी होने को होता है मन
तब फिर
हमारे लिए किसी वाघा का महत्व होगा
न अटारी का
फुर्र से उड़े तो उधर
फुर्र से उड़े तो इधर 

Friday, 5 April 2013

'' पेड़ ''

मैंने
कागज पर लकीरें खींची
डाल बनायी
पत्ते बनाये
अब कागज पर
चित्र -लिखित सा पेड़ खड़ा है
पेड़ ने कहा
'यह मैं हूँ
मुझ पर काले अक्षरों की दुनिया रचकर
किसे बदलना चाहते हो '

मैंने
रंगों से कपड़े में
कुछ लकीरें खींची
डाल बनायीं
पत्ते बनाए
अब
कपड़े पर छपा पेड़ है
पेड़ ने कहा
'यह मैं हूँ
मुझे नंगा कर
किसे ढंकना चाहते हो

'यह जो तुम हो
पेड़ ने कहा
यह भी मैं हूँ
साँसों पर रोक लगाकर
किसे जीवित रखना चाहते हो '

Tuesday, 2 April 2013

''आग''

आदिम युग से
तमाम कोशिशों के बाद
दो पत्थरों की रगड़ में
आग को कैद कर लिया आदमी ने

कभी
स्वयं होकर
जंगल जलाया
और आग ने बताया
कि उसमें कितनी भयावहता है

पृथ्वी के गर्भ की आग
जब करवट लेते-लेते थक जाती
तो
कमजोर जमीन को ध्वस्त कर
निकल पड़ती
पानी के फव्वारों की मानिंद
और धधकती रहती
बेमुद्दत

समुद्र के अंदर की आग
यह
आश्चर्यजनक है
मगर पानी में आग है
और उसकी पहुँच
अब हमारे घर तक है

आदमी ने समाज रचा
उसे गति दी
तो बहुत सी आग ऐसी थी
जो दिखती नहीं थी
ईष्या की आग
बदले की आग
वासना की आग
क्रोध की आग

आग के लिए
सबसे जरुरी था
चूल्हे में रोज जलना
पेट की आग बुझाने के लिए
आग को बुझाने के लिए
आग का जलना
बड़ी अजीब सी बात है
आग का ख़त्म न होने का सिलसिला
चूल्हे की आग
सबकी सबसे ज्यादा जरुरत है
जिनके घर नहीं
वे भी किसी कोने में चूल्हा जला
अपनी खिचड़ी पका लेते हैं
पेट की आग बुझा लेते हैं

मैं हतप्रध सा
तब रह गया
जब एक बेघर ने कहा
''बाबूजी
रोज शमशान की चिता की बची-खुची आग में
पतीले में चांवल पका लेता हूँ
अपनी भूख मिटा लेता हूँ ''

Sunday, 31 March 2013

'' थोड़े से लोग ''

बहुत थोड़े से लोग हैं
जो चीजों को कसकर
पकड़ते हैं
मैं पकड़ नहीं पाया
दिन को पकड़ने की कोशिश में
दिन निकल गया
सुबह-सुबह आँख लगी थी कि
दिन निकल गया
चिड़ियों ने घोसलें बनाने
शुरू ही किये थे
कि दिन निकल गया

Thursday, 28 March 2013

''अँधेरे /उजाले

दिन रात के
अँधेरे- उजाले
और जीवन के अँधेरे -उजाले में
कोई समानता नहीं
तय नहीं
कि अँधेरे के बाद उजाला आयेगा
जीवन में रात का अँधेरा होना ही
अँधेरे का होना नहीं होता
जीवन के उजाले
और
रात के अँधेरे साथ-साथ हो सकते हैं
साथ-साथ हो सकते हैं
जीवन के अँधेरे और दिन के उजाले
काश
जीवन में उजाला ही होता
क्योंकि रात का अँधेरा तो तय ही है

माँ

                 ''माँ''

माँ
तुम्हें अपनी रचना में
स्थान दे रहा हूँ
मुझे मालूम है
तुम्हारा अपने गर्भ में
मुझे स्थान देने जैसा पूण्य कार्य
मेरे लिए सम्भव नहीं

माँ
मैं नहीं जानता
कि तुम्हारी परिभाषा
मेरे हाथों लिखी जाए
क्योंकि मै तुम्हारे साथ-साथ
धरती माँ
और तमाम जीव-जन्तुओं की
जननी का अपराधी कहलाऊंगा
क्योंकि माँ को
गिने-चुने शब्दों में
नहीं बाँधा जा सकता

माँ
तुम्हारा कार्य भी 
प्रचारित करने जैसा नहीं
भीतर तक महसूसने
और स्वीकारने जैसा है

माँ
प्रसव के बाद
तुम गीली देह लिए
मौसमों से जूझती हो
आधी-अधूरी नींद में भी
तुम्हारे `हाथ वहीँ जाते हैं
जहाँ कोमल नन्हीं देह होती है

माँ तुम्हारे सीने में
अदभुत जलधारा प्रवाहित है
जो बच्चे का रक्त संचारित करती है
करती है मस्तिष्क का निमार्ण
फिर सागर की गहराई
और ब्रम्हाण्ड के सारे ग्रह-नक्षत्र से
सीधे संवाद करता है आदमी

जहाँ से आरम्भ होती है
बच्चे की किलकारी
और जहाँ होता है अंतिम पड़ाव
दोनों ही देह
माँ की होती है